महाशिवरात्रि : महंत आवास से भेजी मेहंदी, सारंगनाथ में सजा उत्सव, बाबा और गौरा के हाथ रची मेहंदी

—काशी से सारंगनाथ तक सजा सगुन का उत्सव, मंगल गीतों से गूंजी काशी, शिव-विवाह का बढ़ा उल्लास

महाशिवरात्रि : महंत आवास से भेजी मेहंदी, सारंगनाथ में सजा उत्सव, बाबा और गौरा के हाथ रची मेहंदी

वाराणसी, 14 फरवरी । धर्म नगरी वाराणसी में देवाधिदेव महादेव के विवाहोत्सव (महाशिवरात्रि) के पूर्व संध्या पर शनिवार को श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत के टेढ़ीनीम स्थित आवास पर विविध धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ। इसमें विवाह की एक और प्रमुख रस्म के रूप में बाबा के साथ ही माता गौरा को मेहंदी रचाई गई। टेढ़ीनीम स्थित आवास से परंपरानुसार मेहंदी की थाल बाबा के ससुराल सारनाथ स्थित सारंगनाथ महादेव भेजी गई, जहां ससुरालीजनों ने हल्दी अर्पित कर मेहंदी ग्रहण की। इस मांगलिक परंपरा के साथ ही पूरी काशी सगुनमय हो उठी। इस दौरान “काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ की जय” के जयघोष से गलियां गूंजती रहीं।

—सारंगनाथ में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, गौरा के हाथों में रची मेहंदी

महंत आवास से लोकाचार करते हुए रवाना हुई मेहंदी की सजी थाल जब सारंगनाथ पहुंची तो वहां उल्लास का अद्भुत दृश्य उपस्थित हो गया। ससुराल पक्ष की महिलाओं ने मंगल कलश और आरती की थाल के साथ मेहंदी का स्वागत किया। परंपरा के अनुसार हल्दी अर्पित कर मेहंदी ग्रहण की गई, जिससे विवाह की रस्म पूर्ण मानी जाती है। इसके बाद माता गौरा के विग्रह के हाथों में विधिवत मेहंदी रचाई गई। मंगलगीतों की स्वर-लहरियों के बीच महिलाओं ने पारंपरिक लोकगीत गाए। ढोलक और मंजीरों की थाप पर थिरकते कदमों के साथ वातावरण भक्तिरस में डूब गया।

—महंत आवास पर गूंजे मंगलगीत, निभाई गई प्राचीन परंपरा

इधर, टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर भी पूरे विधि-विधान से विवाह की रस्में संपन्न हुईं। महंत वाचस्पति तिवारी के निर्देशन में मेहंदी भेजने की परंपरा निभाई गई। शिव बारात समिति के माध्यम से (दिलीप सिंह) के साथ महंत आवास के प्रतिनिधि मनोज शर्मा के हाथो मेहंदी सारंगनाथ भेजी गई। महंत आवास परिसर में महिलाओं और भक्तों ने एक स्वर में मंगलगान किया। ढोलक की थाप, शंखध्वनि और हर-हर महादेव के उद्घोष के बीच पूरा वातावरण शिवमय हो उठा।

इस अवसर पर महंत वाचस्पति तिवारी ने कहा कि काशी में बाबा का विवाह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन की परंपरा है। यहां के लोग स्वयं को काशीपुराधिपति की प्रजा मानते हैं और विवाह की प्रत्येक रस्म को राजकीय गरिमा के साथ निभाते हैं।

—'काशीपुराधिपति' की परंपरा: नगर के राजा, जन-जन के आराध्य

काशी में लोक मान्यता है कि यहां के वास्तविक अधिपति स्वयं बाबा विश्वनाथ हैं। इसलिए उन्हें ‘काशीपुराधिपति’ कहा जाता है। नगरवासी स्वयं को उनकी प्रजा और सेवक मानते हैं। यही कारण है कि विवाह की हर रस्म पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। महंत परंपरा इस आस्था की धुरी है।

—सगुन बारात की तैयारी तेज, दंड और छत्र के सानिध्य में निकलेगी शोभायात्रा

अब सबकी निगाहें महादेव की सगुन बारात पर टिकी हैं। काशीपुराधिश्वर, बाबा दंड और छत्र के सानिध्य में भव्य बारात निकलेगी, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होंगे। काशी की गलियां जब बारात के साथ गूंजेंगी, तो वह केवल धार्मिक आयोजन नहीं होगा, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रदर्शन होगा। डमरुओं की नाद, शंखध्वनि और जयघोष के बीच बारात निकलेगी और पूरा नगर शिवमय हो उठेगा।