काशी में गणपति बप्पा मोरया की गूंज, पंडालों में विराजे भगवान गणेश; श्री काशी विश्वनाथ धाम में विधि-विधान से हुआ पूजन

गणेश चतुर्थी पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पंडालों में गणेश प्रतिमाओं की स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा हुई। लालबाग के राजा की प्रतिमूर्ति समेत शहरभर में धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुए।

काशी में गणपति बप्पा मोरया की गूंज, पंडालों में विराजे भगवान गणेश; श्री काशी विश्वनाथ धाम में विधि-विधान से हुआ पूजन

वाराणसी, 14 सितंबर । उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी (वाराणसी) में भादो मास की गणेश चतुर्थी पर सोमवार को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान गणेश की मूर्ति पंडालों में पूरे विधि विधान से स्थापित की गई। भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित कर हवन पूजन के बाद उसमें प्राण प्रतिष्ठा की गई। विविध धार्मिक अनुष्ठान के बाद पंडालों का पट दोपहर में श्रद्धालुओं के लिए खुल गया। उधर, अलसुबह से लोहटिया स्थित बड़ा गणेश दरबार सहित सभी गणेश मंदिरों में व्रती महिलाओं के साथ उनके परिजन भी दर्शन पूजन के लिए पहुंचते रहे।

इसी क्रम में श्री काशी विश्वनाथ धाम में विधि-विधान पूर्वक श्रद्धालुओं, काशीवासियों, अन्य न्यास अधिकारियों एवं कार्मिकों की उपस्थिति में भगवान शिव व माता पार्वती के प्रिय सनातन परंपरा में प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी के उत्सव गणेश चतुर्थी का पूजन संपन्न हुआ।

शिव पुराण के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को मंगलमूर्ति गणेश जी की अवतरण-तिथि मानी गई है। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन रिद्धि सिद्धि के दाता, विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का अवतरण हुआ था। गणेश जी को समस्त देवताओ में प्रथम पूज्य देव कहा गया है। श्री गणेश जी सुख समृद्धि दाता भी हैं। इनकी कृपा से परिवार पर आने वाले संकट और विध्न दूर हो जाते हैं।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास ने भी समस्त सनातन श्रद्धालुओं के मनोरथ पूर्ण होने की मंगलकामनाएं प्रेषित किया। ठठेरी बाजार स्थित शेरवाली कोठी में काशी मराठा गणेश उत्सव समिति की ओर से आयोजित गणेशोत्सव में पहले दिन मुम्बई के सुप्रसिद्ध लालबाग के राजा की प्रतिमूर्ति को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विराजित कराया गया। मराठा विधि से मंत्रोंच्चार के बीच मूर्ति स्थापित कराई। इस क्रम में नूतन बालक गणेशोत्सव समाज सेवा मंडल के सप्तदिवसीय महोत्सव का आगाज हुआ। पहले गणेश जी की प्रतिमा को दूधविनायक से पालकी में परंपरागत पद “गजानना ला नेऊ घरी” गाकर लाया गया । इसके बाद गणेश जी का औक्षण (आरती) की गई। इसी तरह शहर के अन्य पूजा पंडालों में गणपति बप्पा मोरया के जयकारे के साथ पूजन आरंभ हो गया। बाल गणेश की प्राकट्य की बेला में मंदिरों में श्रृंगार, पूजन एवं आरती के विधान संपादित किए गए, वहीं विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों द्वारा विविध सांस्कृतिक अनुष्ठानों के आयोजन भी आरंभ हो गए। वेदमंत्रों के साथ षोडशोपचार पूजन किया गया। मंगलमूर्ति को लड्डू व मोदक का भोग लगा।