प्रेमचंद को साहित्यकार बनाने में प्रयाग का महत्वपूर्ण योगदान : रविनन्दन सिंह
प्रयागराज फिर बने साहित्य की राजधानी : प्रो. सत्यकाम
प्रयागराज, 31। मुंशी प्रेमचंद को साहित्यकार बनाने में प्रयाग का महत्वपूर्ण योगदान रहा। प्रेमचंद की साहित्यिक यात्रा के कई महत्वपूर्ण पड़ाव प्रयागराज से जुड़े रहे हैं। उक्त बात शुक्रवार को उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के मानविकी विद्याशाखा के तत्वावधान में शुक्रवार को प्रेमचंद जयंती के अवसर पर प्रयाग में प्रेमचंद विषय पर विशेष व्याख्यान में बतौर मुख्य वक्ता प्रख्यात साहित्यकार एवं आलोचक रविनन्दन सिंह ने कहा।
उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की पहली पुस्तक 'प्रेमा' इंडियन प्रेस से प्रकाशित हुई थी। इसके बाद उन्होंने अनेक कालजयी उपन्यासों और कहानियों की रचना की। उनका पहला उपलब्ध उपन्यास 'असरारे महाविद' था, जबकि 'सोजे वतन' में राष्ट्रीय भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में तत्कालीन न्याय व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था का प्रभावी चित्रण किया। प्रयाग ने प्रेमचंद के साहित्यिक व्यक्तित्व को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद प्रयाग आते-जाते रहते थे और शहर की प्रतिष्ठित हिंदुस्तानी अकादमी जैसी संस्थाएं भी उनके साहित्यिक जीवन से जुड़ी रहीं। रविनन्दन सिंह ने बताया कि वर्ष 1904 में प्रेमचंद शिक्षक प्रशिक्षण के सिलसिले में प्रयाग आए थे। बाद में उन्होंने मॉडल स्कूल ट्रेनिंग कॉलेज में प्रधानाध्यापक के रूप में भी सेवाएं दीं। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और हिंदी साहित्य सम्मेलन के कई अधिवेशनों में भाग लिया। उनके पुत्रों की शिक्षा भी कायस्थ पाठशाला में हुई। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की रचनाएं आज भी समाज को सोचने और बदलाव के लिए प्रेरित करती हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. सत्यकाम ने कहा कि प्रेमचंद के उपन्यासों में राष्ट्र की व्यापक परिकल्पना दिखाई देती है। उनके साहित्य का अध्ययन सभी को करना चाहिए। जब समाजशास्त्री, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री और सामाजिक सुधारक प्रेमचंद की रचनाओं का अध्ययन करते हैं तो उनमें समाज को समझने की नई दृष्टि विकसित होती है और इसका लाभ समाज को मिलता है।
कुलपति ने प्रेमचंद के उपन्यास 'रंगभूमि'और कहानी 'नमक का दरोगा' का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी सामाजिक सरोकारों के कारण प्रासंगिक है। उन्होंने विश्वविद्यालय के सभी विद्याशाखाओं के आचार्यों से प्रेमचंद की रचनाओं का अध्ययन करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि प्रयागराज में उत्कृष्ट साहित्य का सृजन होना चाहिए और इस नगर को प्रेमचंद, पंत, निराला और महादेवी की साहित्यिक परंपरा से जोड़ते हुए फिर से साहित्य की राजधानी के रूप में स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए।
विश्वविद्यालय के कुलपति ने आगे कहा कि प्रयागराज को फिर से प्रेमचंद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और महादेवी वर्मा की साहित्यिक परंपरा वाला नगर बनाना होगा। इसके लिए उत्कृष्ट साहित्य सृजन को बढ़ावा देना जरूरी है, ताकि प्रयागराज को फिर से साहित्य की राजधानी के रूप में स्थापित किया जा सके।
उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के मानविकी विद्याशाखा के तत्वावधान में शुक्रवार को प्रेमचंद जयंती के अवसर पर प्रयाग में प्रेमचंद' विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया।
विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. रुचि वाजपेयी ने कहा कि प्रेमचंद का प्रयागराज से गहरा और ऐतिहासिक संबंध रहा है। उनकी साहित्यिक यात्रा और जीवन के कई महत्वपूर्ण पड़ाव प्रयागराज से जुड़े हुए थे। कार्यक्रम के संयोजक प्रो. सत्यपाल तिवारी ने कहा कि प्रयागराज प्रेमचंद की रचनात्मक ऊर्जा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। उन्होंने बताया कि प्रेमचंद ने अपने शुरुआती लेखन में 'नवाब राय इलाहाबादी' नाम का भी प्रयोग किया था।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर और दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इसके बाद राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' और विश्वविद्यालय के कुलगीत का गायन हुआ। संचालन सह-आयोजन सचिव डॉ. अब्दुल रहमान ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. विनोद कुमार गुप्त ने किया।
कार्यक्रम की जानकारी देते हुए विश्वविद्यालय के मीडिया प्रभारी एवं जनसंपर्क अधिकारी डॉ. प्रभात चन्द्र मिश्र ने बताया कि प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आयोजित इस व्याख्यान का उद्देश्य विद्यार्थियों और शिक्षकों को प्रेमचंद के साहित्य तथा प्रयागराज से उनके ऐतिहासिक एवं साहित्यिक संबंध से परिचित कराना था। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।