दहेज हत्या के आरोप में ननदों को जारी सम्मन रद्द

--कोर्ट ने कहा धारा 319 का इस्तेमाल सावधानी से करना जरूरी

दहेज हत्या के आरोप में ननदों को जारी सम्मन रद्द

प्रयागराज, 20 अप्रैल। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मुख्य अभियुक्तों के बरी होने के बाद ट्रायल कोर्ट द्वारा अतिरिक्त अभियुक्तों को सम्मन करने के आदेश को विधि विरुद्ध करार देते हुए निरस्त कर दिया है।

न्यायमूर्ति मनोज बजाज की पीठ ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत शक्तियों का प्रयोग अत्यंत सावधानी और ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

बागपत जिले के थाना बड़ौत जहां मार्च 2009 में एक महिला रचना का विवाह प्रदीप से हुआ। विवाह के एक वर्ष के भीतर जनवरी 2010 में रचना की जलने के कारण मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद उसके पिता मैनपाल ने पति और ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों के विरुद्ध दहेज हत्या और उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था। पुलिस जांच के दौरान मृतका के मृत्यु पूर्व बयान और अन्य साक्ष्यों के आधार पर याचिकाकर्ता संख्या 3 से 5, जो कि पति की अविवाहित बहनें हैं, को निर्दोष पाया गया था और उनके विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया था।

हालांकि, ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों के आधार पर अपर सत्र न्यायाधीश, फास्ट ट्रैक कोर्ट, बागपत ने 3 मार्च 2011 को एक आदेश पारित कर इन बहनों को भी अतिरिक्त अभियुक्त के रूप में समन कर लिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दायर की गई थी।

उच्च न्यायालय ने अपने विस्तृत निर्णय में पाया कि मृतका ने अपने मृत्यु पूर्व बयान में केवल अपनी सास मुनेश का उल्लेख किया था और बहनों के विरुद्ध दहेज की मांग के कोई विशिष्ट आरोप नहीं थे। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि धारा 319 के तहत असाधारण शक्तियों का प्रयोग केवल ट्रायल के दौरान आए उन साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए जो किसी व्यक्ति की संलिप्तता को मजबूती से दर्शाते हों, न कि केवल प्राथमिकी की बातों को दोहराने मात्र से।

अदालत ने यह भी संज्ञान में लिया कि याचिकाकर्ता संख्या 1 और 2 (ऋषिपाल और नितिन) पहले ही मुख्य मुकदमे के साथ ट्रायल का सामना कर चुके हैं और 29 मार्च 2012 को उन्हें बरी किया जा चुका है, जिसके कारण उनके संबंध में यह याचिका निष्प्रभावी हो गई। अंततः, कोर्ट ने अविवाहित बहनों (याचिकाकर्ता संख्या 3, 4 और 5) के विरुद्ध जारी सम्मन आदेश को अवैध मानते हुए रद्द कर दिया और उन्हें इस मामले से राहत प्रदान की।