किरायेदारी से जुड़े विवाद में ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

किरायेदारी से जुड़े विवाद में ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

किरायेदारी से जुड़े विवाद में ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

प्रयागराज, 03 अप्रैल । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि पक्षकारों को संशोधन की अनुमति देने का निर्णय न्यायहित में होना चाहिए। यह ऐसा नहीं होना चाहिए, जिससे पक्षकारों के अधिकार प्रभावित होते हों।

न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने कानपुर निवासी मुन्नी देवी की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है। याची ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत याचिका दायर कर 16 जुलाई 2025 को अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, न्यायालय संख्या आठ कानपुर नगर द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने याची का वह आवेदन अस्वीकार कर लिया था जो सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश सात नियम 17 के तहत दिया गया था।

मुकदमे से जुड़े तथ्य यह हैं कि याची किरायेदार थी। मकान मालिक शशिकला ने 2013 में वाद दायर कर याची (पूर्व केस में प्रतिवादी) को सम्पत्ति से बेदखल करने की मांग की थी। बकाया किराया तथा क्षतिपूर्ति भी मांगी थी। सम्बंधित अदालत ने 29 फरवरी 2024 को मामला निर्णीत किया। इसके खिलाफ पुनरीक्षण (रिवीजन) दाखिल किया गया जो सात नवम्बर 2024 को खारिज कर दिया गया। इन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा, सीपीसी के आदेश 7 नियम 17 का परंतुक का पुनरीक्षण या अपीलीय कार्यवाही में आधारों के संशोधन पर सख्ती से लागू नहीं होता। इसमें ‘उचित परिश्रम’ की आवश्यकता नहीं है, लेकिन पक्षकारों को नए तथ्यात्मक दावे पेश करने या बाध्यकारी स्वीकारोक्ति वापस लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

आदेश सात नियम 17 के परंतुक का उद्देश्य ऐसे आवेदनों को रोकना है जो ट्रायल में देरी के लिए दायर किए जाते हैं। कोर्ट ने पाया कि याची का व्यवहार यह दर्शाता है कि वर्तमान आवेदन वास्तविक नहीं है। यह प्रयास है पूर्व आदेशों को दरकिनार कर अंतिम निर्णय में देरी करने का। कोर्ट ने यह भी कहा है कि इस अदालत (हाईकोर्ट) का पर्यवेक्षण क्षेत्राधिकार अनुच्छेद 227 के तहत हर तर्क की त्रुटि को सुधारने के लिए नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए है कि अधीनस्थ न्यायालय अपने अधिकारों के दायरे में और कानून के अनुसार कार्य करें। हस्तक्षेप केवल तभी आवश्यक है जब स्पष्ट अवैधता या विकृति हो। वर्तमान मामले में, संशोधन आवेदन का अस्वीकृति पूरी तरह से उचित है।