दुनिया में अमन शांति के लिए यौमे आशूरा जुलूस में खून बहा रहा हूं — स्वामी सारंग
दुनिया में अमन शांति के लिए यौमे आशूरा जुलूस में खून बहा रहा हूं — स्वामी सारंग
लखनऊ में यौमे आशूरा के पवित्र अवसर पर एक अनूठा और हृदयस्पर्शी दृश्य देखने को मिला, जब एक हिंदू धर्मगुरु ने मुस्लिम समुदाय के साथ एकजुटता और वैश्विक शांति की कामना में अपने शरीर से रक्त बहाया। "दुनिया में अमन शांति के लिए यौमे आशूरा जुलूस में खून बहा रहा हूं," यह उद्घोषणा थी स्वामी सारंग की, जिन्होंने वर्षों से चली आ रही अपनी परंपरा को निभाते हुए इस जुलूस में भाग लिया।
रविवार, 06 जुलाई को लखनऊ के ऐतिहासिक नाजिम अली इमामबाड़ा से आरंभ हुए यौमे आशूरा के भव्य जुलूस में शिरकत करते हुए स्वामी सारंग ने न केवल उपस्थित जनसमूह को चौंकाया, बल्कि एकता और सद्भाव का एक सशक्त संदेश भी दिया। यह जुलूस, जो शिया इस्लाम में कर्बला के शहीदों की याद में निकाला जाता है, लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक भी है।
इस भावुक और श्रद्धापूर्ण अवसर पर, धर्मगुरु स्वामी सारंग ने अपने हाथों में कोड़े लेकर स्वयं पर आघात किया, जिसे 'मातम' कहा जाता है। यह क्रिया, जो आम तौर पर शिया मुस्लिम अनुयायियों द्वारा इमाम हुसैन की शहादत के गम में की जाती है, को स्वामी सारंग ने एक गहरे आध्यात्मिक और मानवीय उद्देश्य से जोड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया, "मैं दुनिया में अमन और शांति को कायम करने के लिए इस यौमे आशूरा के जुलूस में खून बहा रहा हूं। मेरा मानना है कि शांति को स्थापित करने के लिए बलिदान और स्वयं को समर्पित करना आवश्यक है।" उन्होंने आगे कहा कि यह उनके लिए सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि हजरत इमाम हुसैन को एक हार्दिक 'नजराना' (श्रद्धांजलि) है, जो उनके अदम्य साहस और न्याय के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है।
स्वामी सारंग ने विशेष रूप से कर्बला की घटना और हजरत इमाम हुसैन के संदेश का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, "इमाम हुसैन ने कर्बला में जो पैगाम दिया, वह मुझे बहुत प्रभावित करता है।" यह संदेश सत्य, न्याय और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए किसी भी कठिनाई का सामना करने और सर्वोच्च बलिदान देने का है। स्वामी सारंग के अनुसार, यह सार्वभौमिक संदेश किसी एक धर्म तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए प्रासंगिक है।
यह पहली बार नहीं था जब स्वामी सारंग इस जुलूस में शामिल हुए। उन्होंने बताया कि आशूरा के जुलूस में उनका आना हर साल रहता है और वे इसमें शामिल होकर पूरी श्रद्धा के साथ मातम करते हैं। उनका यह वार्षिक योगदान न केवल लखनऊ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है, बल्कि विभिन्न धर्मों के बीच सद्भाव और आपसी सम्मान की एक मिसाल भी पेश करता है। यह घटना दर्शाती है कि कैसे धार्मिक सीमाएं पार कर लोग एक-दूसरे के प्रति सम्मान और साझा मानवीय मूल्यों के आधार पर एकजुट हो सकते हैं।