पत्नी की हत्या मामले में वकील की सजा पर हाईकोर्ट के जजों में मतभेद

-एक जज ने बरी किया, दूसरे ने उम्रकैद की सजा बरकरार रखी

पत्नी की हत्या मामले में वकील की सजा पर हाईकोर्ट के जजों में मतभेद

प्रयागराज, 11 नवंबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ के बीच फतेहपुर के एक वकील द्वारा दायर 29 साल पुरानी आपराधिक अपील पर फैसला सुनाते समय आपस में मतभेद हो गया। वकील को 1991 में अपनी पत्नी की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था, क्योंकि पत्नी ने कथित तौर पर उसके नाम पर धन और सम्पत्ति हस्तांतरित करने से इनकार कर दिया था।

न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय ने कहा कि अभियोजन पक्ष हत्या के आरोप को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा और अपीलकर्ता को बरी कर दिया। जबकि न्यायमूर्ति संदीप जैन ने साक्ष्य को ’विश्वसनीय’ पाया और इस प्रकार निचली अदालत के दोष सिद्धि को बरकरार रखा तथा आरोपित को आजीवन कारावास की सजा काटने के लिए एक महीने के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

क्योंकि दोनों न्यायाधीशों के तर्क और अंतिम परिणाम दोनों पर मतभेद थे। इसलिए मामला सीआरपीसी की धारा 392 के तहत तीसरे न्यायाधीश के नामांकन के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा गया है। अपील में फतेहपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के अप्रैल 1996 के फैसले और आदेश को चुनौती दी गई थी। जिसमें शैलेन्द्र कुमार मिश्रा (अपीलकर्ता) को 26 जुलाई, 1991 को अपनी पत्नी सुनीता देवी की गोली मारकर हत्या करने के लिए दोषी ठहराया गया था। उसे आजीवन कारावास की सजा मिली थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतका (सुनीता देवी) की पहली शादी अपीलकर्ता के बड़े भाई से हुई थी, जिनकी एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। बाद में उन्हें वायुसेना से 2 लाख रुपये मिले और बाद में उन्होंने अपीलकर्ता, जो उनके देवर थे, से शादी कर ली। इसके बाद, मृतका और अपीलकर्ता के बीच वैवाहिक सम्बंध तनावपूर्ण हो गए। क्योंकि अपीलकर्ता लगातार उस पर अपनी धनराशि और ज़मीन-जायदाद अपीलकर्ता के पक्ष में हस्तांतरित करने का दबाव डाल रहा था। 26 जुलाई, 1991 को, जब उसने फिर से उसकी माँग ठुकरा दी, तो अपीलकर्ता ने कथित तौर पर उसे बहुत करीब से गोली मार दी।