निलंबन को चुनौती देने वाली रिटायर्ड प्रधानाध्यापक की याचिका हाईकाेर्ट में खारिज

रिटायर्ड प्रधानाध्यापक की याचिका खारिज

निलंबन को चुनौती देने वाली रिटायर्ड प्रधानाध्यापक की याचिका हाईकाेर्ट में खारिज

प्रयागराज, 21 अगस्त । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मथुरा जिले के एक सेवानिवृत्त हेडमास्टर कांता प्रसाद की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने 1992 में हुए अपने निलंबन को चुनौती देते हुए वेतन, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों की मांग की थी। न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया।

कांता प्रसाद मथुरा के सरखंड खेड़ा स्थित प्राथमिक विद्यालय में हेडमास्टर के पद पर कार्यरत थे। 10 फरवरी 1992 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, मथुरा ने उन्हें निलंबित कर दिया था। आरोप था कि उन्होंने विद्यालय का चार्ज अपने उत्तराधिकारी को नहीं सौंपा और कैश बुक, पासबुक व चेक बुक जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज अपने पास रखे रहे।

बलदेव थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 409 के तहत एफआईआर दर्ज हुआ। 1997 में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मथुरा ने उन्हें दोषी करार देते हुए एक साल की सजा और 2,000 रुपये जुर्माना लगाया। अपील और पुनरीक्षण, दोनों में यह फैसला बरकरार रहा । पुनरीक्षण याचिका 31 मार्च 2018 को खारिज हुई।

कांता प्रसाद 30 जून 2000 को 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हो गए, लेकिन तब तक भी उनका निलंबन बहाल नहीं हुआ था। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने कई प्रत्यावेदन दिए और सूचना के अधिकार के तहत आवेदन भी किया, लेकिन विभाग की ओर से लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

1 जुलाई 2020 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी और चार सदस्यीय समिति ने उनके सभी प्रत्यावेदन खारिज करते हुए आदेश जारी किया कि दोषसिद्धि और निलंबन अवधि में विद्यालय में उपस्थिति दर्ज न कराने के कारण उन्हें निलंबन भत्ता व पेंशन का लाभ नहीं दिया जा सकता। हालांकि जीपीएफ व सामूहिक बीमा की राशि का भुगतान कर दिया गया था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याची न तो स्थानांतरण के बाद निर्धारित स्थान पर उपस्थित हुए और न ही उन्होंने विभागीय जांच में सहयोग किया। कोर्ट ने कहा कि "काम नहीं तो वेतन नहीं" का सिद्धांत इस मामले में प्रासंगिक है, और याची यह साबित नहीं कर सके कि वे कार्य पर लौटने को इच्छुक थे मगर विभाग ने उन्हें रोका।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनरीक्षण न्यायालय के आदेश को "सम्मानजनक दोषमुक्ति" नहीं माना जा सकता, इसलिए याची को समस्त अवधि का वेतन पाने का स्वतः अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। कोर्ट ने कहा कि लंबे निलंबन का अर्थ यह नहीं कि कर्मचारी को पूरा वेतन पाने का अधिकार मिल जाता है।

न्यायालय ने कहा कि विभाग के 1 जुलाई 2020 के आदेश में कोई कानूनी खामी नहीं है, और याची अपने सेवाकाल में शेष किसी भी लाभ का हकदार नहीं है क्योंकि जीपीएफ और बीमा राशि पहले ही भुगतान की जा चुकी है।