जन्म और मृत्यु पंजीकरण एक्ट के तहत जारी प्रमाण पत्र तब तक मान्य है, जब तक उसे रद्द न किया जाए : हाईकोर्ट

जन्म और मृत्यु पंजीकरण एक्ट के तहत जारी प्रमाण पत्र तब तक मान्य है, जब तक उसे रद्द न किया जाए : हाईकोर्ट

जन्म और मृत्यु पंजीकरण एक्ट के तहत जारी प्रमाण पत्र तब तक मान्य है, जब तक उसे रद्द न किया जाए : हाईकोर्ट

प्रयागराज, 17 अप्रैल । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत जारी जन्म प्रमाण पत्र तब तक वैध और मान्य है, जब तक उसे रद्द न कर दिया जाए या उसमें जालसाज़ी साबित न हो जाए।

कक्षा 6 में दाखिले से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने कहाः “जब तक कोई दस्तावेज़, जो किसी वैधानिक प्रावधान के तहत जारी किया गया, या तो रद्द न कर दिया जाए या उसमें जालसाज़ी का कोई तत्व साबित न हो जाए, तब तक उसका सम्बंधित अधिकारियों पर बाध्यकारी प्रभाव रहेगा।

कोर्ट ने विमल सिंह की याचिका को निस्तारित करते हुए कहा कि सम्बंधित अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में यह नहीं आता कि वे अपनी मनमर्जी के आधार पर, किसी वैधानिक प्रावधान के तहत जारी प्रमाण पत्र पर संदेह करें। जन्म प्रमाण पत्र में याचिकाकर्ता की जन्म तिथि 01 जुलाई 2013 दर्ज थी। पीएम श्री स्कूल जवाहर नवोदय विद्यालय में कक्षा 6 में दाखिले के लिए उम्मीदवार का जन्म 01 मई 2013 और 30 जुलाई 2015 के बीच होना चाहिए। चूंकि जन्म प्रमाण पत्र पर संदेह के आधार पर याचिकाकर्ता को दाखिला देने से मना कर दिया गया, इसलिए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया। यह दलील दी गई कि जन्म प्रमाण पत्र रद्द किए बिना याचिकाकर्ता को दाखिला देने से मना नहीं किया जा सकता। प्रतिवादी ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि जन्म तिथि में एक साल से लेकर 6 महीने तक का अंतर हो सकता है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि हड्डियों के विकास की जांच को पूरी तरह सटीक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह केवल प्लस-माइनस 2 साल तक ही सटीक होती है। कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि सीएमओ की रिपोर्ट में दर्ज अंतर के आधार पर जन्म प्रमाण पत्र रद्द किए बिना एडमिशन देने से मना करना ’शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’ के तहत शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है। इसलिए, कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को एडमिशन दिया जाए।

इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी पाया कि हाईकोर्ट में ऐसी कई याचिकाएं दायर की जा रही थीं, जिनमें सिर्फ़ मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर दस्तावेज़ों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा था। इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि मेडिकल राय तभी ली जा सकती है, जब निम्न दस्तावेज उपलब्ध न हों।

हाईकोर्ट ने कहा (1) सक्षम अधिकारियों-बोर्ड द्वारा जारी किया गया मैट्रिकुलेशन प्रमाण पत्र (या उसके समकक्ष)। (2) ऐसे दस्तावेज़, जो बच्चे के सबसे पहले जिस स्कूल में एडमिशन लिया था, वहां दर्ज जन्म तिथि को साबित करते हों, और उस स्कूल के प्रिंसिपल द्वारा विधिवत प्रमाणित हों। (3) निगम, नगर पालिका प्राधिकरण या पंचायत द्वारा जारी किया गया जन्म प्रमाण पत्र।” कोर्ट ने यह भी कहा कि ऊपर बताए गए दस्तावेज़ों का सत्यापन किया जाएगा।