सनातन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समावेशी प्रवृत्ति है : प्रो. हरि नारायण दुबे
सनातन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समावेशी प्रवृत्ति है : प्रो. हरि नारायण दुबे
प्रयागराज, 22 जुलाई । सनातन केवल धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि मानवता, समरसता और शाश्वत जीवन-दृष्टि का प्रतीक है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी समावेशी प्रवृत्ति है, जो सभी विचारों को आत्मसात करते हुए लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।
यह विचार बुधवार उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय की समाज विज्ञान विद्याशाखा के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के पूर्व आचार्य प्रो. हरि नारायण दुबे ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति विश्व कल्याण की भावना पर आधारित है तथा सनातन का मूल आधार सत्य, कर्तव्य और लोकमंगल है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में भारतीय सनातन जीवन-पद्धति और सांस्कृतिक मूल्यों को विकृत करने के प्रयास हुए, जिनका प्रभावी उत्तर महामना मदन मोहन मालवीय ने वर्ष 1933 में प्रारंभ की गई सनातन धर्म' पत्रिका के माध्यम से दिया।
उन्होंने कहा कि सनातन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समावेशी प्रवृत्ति है। यह किसी के प्रति वैरभाव नहीं रखता, बल्कि सभी विचारों को आत्मसात करने की क्षमता रखता है। महात्मा गौतम बुद्ध से लेकर महात्मा गांधी तक भारतीय चिंतन की मूलधारा में समरसता, सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव की भावना इसी सनातन परंपरा का परिचायक है। उन्होंने संस्कृति को पुष्प की सुगंध और सभ्यता को उसकी पंखुड़ियों की उपमा देते हुए आधुनिक तकनीकी युग में डिजिटल माध्यमों के विवेकपूर्ण उपयोग पर भी बल दिया।
विश्वविद्यालय की समाज विज्ञान विद्याशाखा के तत्वावधान में सरस्वती परिसर स्थित लोकमान्य तिलक सभागार में "भारतीय संस्कृति में सनातन की अवधारणा" विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत्यकाम ने कहा कि सनातन वैदिक चेतना का वह शाश्वत भाव है, जो समस्त मानवता को साथ लेकर चलने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी गतिशीलता है, जिसमें न जड़ता है और न संकीर्णता। यह निरंतर विकसित होने वाली जीवनधारा है, जो प्रत्येक युग में नए विचारों को आत्मसात करती रही है। प्रो. सत्यकाम ने कहा कि सनातन को किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसका वास्तविक स्वरूप समावेश, संवाद, सहअस्तित्व और मानव कल्याण में निहित है। उन्होंने मूर्ति-पूजन को मानव सभ्यता की प्राचीन एवं सार्वभौमिक परंपरा बताते हुए कहा कि इतिहास के विभिन्न कालखंडों में विश्व की अनेक सभ्यताओं में इसकी उपस्थिति रही है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में समाज विज्ञान विद्याशाखा के निदेशक एवं संगोष्ठी के समन्वयक प्रो. एस. कुमार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। आयोजन सचिव डॉ. सुबास चन्द पाल ने आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुनील कुमार ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. त्रिविक्रम तिवारी ने किया। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के निदेशकगण, आचार्य, सहायक आचार्य, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।