भीषण गर्मी से राहत के लिए काशी में अनोखा अनुष्ठान, राग 'मेघ' से इंद्रदेव को रिझाने की कोशिश
भीषण गर्मी से राहत के लिए काशी में अनोखा अनुष्ठान, राग 'मेघ' से इंद्रदेव को रिझाने की कोशिश
वाराणसी, 16 जून। ज्येष्ठ-आषाढ़ माह की तपती दुपहरी और प्रचंड गर्मी से बेहाल नागरिकों एवं मूक पशु—पक्षियों को राहत दिलाने के लिए धर्मनगरी काशी (वाराणसी) में मंगलवार को एक अनूठा और सांस्कृतिक अनुष्ठान देखने को मिला। काशी के ऐतिहासिक रीवां घाट पर सुबह-सबेरे श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के शहनाई वादक पंडित महेंद्र प्रसन्ना और उनकी पूरी टीम ने भगवान इंद्रदेव को प्रसन्न करने के पहले मां गंगा का पूजन किया।
इसके बाद अनुष्ठान की शुरुआत में कलाकारों ने मां गंगा को पारंपरिक 'पियरी' (पीला वस्त्र) अर्पित कर उनका वंदन किया और उनसे लोक-कल्याण की कामना की। राग 'मेघ' से बादलों को आमंत्रण - वैदिक काल से ही माना जाता रहा है कि शास्त्रीय संगीत के कुछ रागों में प्रकृति को बदलने की शक्ति होती है। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए पंडित महेंद्र प्रसन्ना ने अपनी शहनाई पर राग मेघ को साधा । शहनाई से निकले इस राग के गंभीर और मधुर स्वरों ने घाट पर मौजूद हर श्रद्धालु को मंत्रमुग्ध कर दिया। ऐसा लगा मानो सुरों के माध्यम से आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादलों को सीधे काशी आने का निमंत्रण दिया जा रहा हो।
—"इंद्र बरसो रे काशी नगरिया..." से हुआ पूर्णाहूति
राग मेघ के शास्त्रीय वादन के बाद, टीम ने क्लासिकल संगीत और पारंपरिक भजनों की झड़ी लगा दी। शहनाई की जादुई धुन पर जब लोक-भावनाओं को समेटे हुए भजन गूंजे, तो घाट का पूरा माहौल भक्तिमय हो उठा।
सांस्कृतिक धरोहर और आस्था का मिलन
कलाकार महेन्द्र प्रसन्ना ने शहनाई बजाने के बाद कहा कि काशी सिर्फ धर्म की ही नहीं, बल्कि संगीत की भी राजधानी है। जब-जब काशी पर कोई संकट या प्राकृतिक आपदा (जैसे भीषण गर्मी या सूखा) आती है, तब यहां के कलाकार और विद्वान अपनी कला को ही ईश्वर की आराधना का माध्यम बना लेते हैं। रीवा घाट पर हुआ यह आयोजन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आज भी काशी की रगों में बाबा बिस्मिल्लाह खान की शहनाई और शास्त्रीय परंपराएं जिंदा हैं, जो लोक-कल्याण के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं।
उधर घाट पर मौजूद श्रद्धालुओं ने कहा कि काशी में मान्यता है कि जब इंसान की प्रार्थनाओं में सुरों का तालमेल जुड़ जाता है, तो देवता भी पिघल जाते हैं। इसी आस के साथ सुर-सरिता के माध्यम से काशी को झुलसाने वाली गर्मी से निजात दिलाने की प्रार्थना की गई। लोगों ने उम्मीद जताई कि शहनाई की यह पुकार सीधे इंद्रलोक तक पहुंचेगी और जल्द ही काशी कल्याणी पर बादलों की मेहरबानी होगी। इंद्रदेव को साधने में शहनाई वादक पंडित महेंद्र प्रसन्ना के साथ उनकी टीम में गणेश प्रसाद, सहयोगी शहनाई वादक,केदारनाथ मिश्र, दुकड़ (पारंपरिक अवनद्ध वाद्य),मालचंद स्वर (गायन सहयोग) प्रभात प्रसन्ना शामिल रहे।----