भविष्य में देश का सर्वश्रेष्ठ ज्ञानपीठ बनेगा 'एकात्म धाम' : स्वामी गोविन्ददेव गिरि
भविष्य में देश का सर्वश्रेष्ठ ज्ञानपीठ बनेगा 'एकात्म धाम' : स्वामी गोविन्ददेव गिरि
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महाकुम्भ नगर, 11फरवरी(हि.स.)। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास के एकात्म धाम शिविर में “शंकरो लोकशंकर:” कथा के चतुर्थ दिवस में राम जन्मभूमि न्यास के कोषाध्यक्ष कथा व्यास स्वामी गोविन्ददेव गिरि ने श्रोताओं को आदि शंकराचार्य के विभिन्न जीवन प्रसंगों को सुनाया।
कथा के दौरान स्वामी गोविंददेव गिरि ने आचार्य शंकर के जीवन के प्रेरणादायक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि प्रयागराज वह पुण्यभूमि है, जहाँ आदि शंकराचार्य की महापुरुष कुमारिल भट्ट से भेंट हुई, भेंट के समय कुमारिल भट्ट ने आदि शंकराचार्य की प्रशंसा करते हुए कहा, “आपके इस भाष्य ने धरती को धन्य कर दिया।” यह वही प्रयाग है, जहाँ कुमारिल नाम के सूर्य का अस्त हुआ और शंकर नाम के सूर्य का उदय हुआ। इसी भूमि से भगवान शंकराचार्य मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ के लिए महिष्मति की ओर बढ़े।
उन्हाेंने बताया कि आदि शंकराचार्य और मण्डन मिश्र के मध्य ऐतिहासिक शास्त्रार्थ में मण्डन मिश्र की पत्नी उभय भारती ने निर्णायक की भूमिका निभाई, जिसे शंकराचार्य ने भी सहर्ष स्वीकार किया। यह शास्त्रार्थ 18 दिनों तक चला और अन्त में उभय भारती ने आचार्य शंकर को विजयी घोषित किया। इसके बाद उन्होंने स्वयं शंकराचार्य को शास्त्रार्थ की चुनौती दी, जिसमें उभय भारती भी पराजित हुईं। इस शास्त्रार्थ के उपरांत मण्डन मिश्र सन्यासी होकर शंकराचार्य के शिष्य सुरेश्वराचार्य बने। आचार्य शंकर की मातृभक्ति भी अनुपम थी। वे अपनी माता आर्याम्बा के देहावसान से पूर्व केरल गए और उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन कराए।
उन्हाेंने कहा कि भगवान शंकराचार्य की विशेषता यह थी कि वे किसी भी विचार का पूर्णतः खण्डन नहीं करते थे। वे केवल त्याज्य को खारिज करते थे और ग्राह्य का मार्ग प्रशस्त करते थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हमारा हर शास्त्र और हर कला ईश्वर प्राप्ति के लिए है। भगवान शंकराचार्य के हर स्तोत्र के पीछे एक विशेष प्रसंग है, जो उनके विचारों और जीवन दर्शन को परिभाषित करता है।
उन्हाेंने कहा कि भारत में नास्तिकता और आस्तिकता का भेद ईश्वर को मानने या न मानने से नहीं होता, बल्कि वेदों को प्रमाण मानने से होता है। उनके अनुसार, आचरण कर्मशील होना चाहिए, जितना सकाम कर्म करेंगे, उतना फल प्राप्त होगा। जितना निष्काम कर्म करेंगे, उतनी चित्त की शुद्धि होगी। कर्म से चित्त शुद्ध होता है, उपासना से एकाग्रता आती है और तभी व्यक्ति ज्ञान प्राप्ति के योग्य बनता है। भगवान शंकराचार्य ने यह भी दिखाया कि महापुरुषों को अपने जीवन में अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है, फिर भी वे विश्व के कल्याण हेतु अपने मार्ग पर चलते रहते हैं। उन्होंने जीवन के आदर्श स्वरूप को कर्म, उपासना और ज्ञान के माध्यम से प्रस्तुत किया।
एकात्म धाम के संदर्भ में आचार्य गोविन्ददेव गिरि ने कहा कि यह कोई साधारण संस्था नहीं है। यदि प्रयास निरंतर जारी रहे, तो यह धाम देश का सर्वश्रेष्ठ ज्ञानपीठ सिद्ध होगा। भगवान शंकराचार्य की महानता को विश्वभर में स्थापित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। यह सुनिश्चित करना होगा कि पूरी दुनिया में “भगवान शंकराचार्य की जय” की गूंज सुनाई दे। इसके लिए सम्यक प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं।
ज्ञात हो कि एकात्म धाम शिविर में प्रतिदिन वैदिक अनुष्ठान, प्रवचन और ध्यान सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। प्रातःकाल में स्वामी योगप्रताप सरस्वती के मार्गदर्शन में ध्यान सत्र का आयोजन हुआ, वहीं स्वामिनी सद्विद्यानंद सरस्वती ने मांडूक्य एवं स्वामिनी माँ पूर्णप्रज्ञा द्वारा माण्डूक्य कारिका पर साधकों को संबोधित किया गया।
पुस्तक प्रदर्शनी में वेदांत पर केंद्रित हजारों पुस्तकें
एकात्म धाम द्वारा लगाई गई पुस्तक प्रदर्शनी एवं स्टॉल में वेदांत पर केंद्रित हजारों पुस्तकें उपलब्ध है, देशभर के विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित यह पुस्तकें महाकुम्भ आने वाले श्रद्धालु बड़ी संख्या में खरीद रहे हैं।